Friday, 7 September 2012

पत्रों में बिहार

पुस्तक समीक्षा

अजय पाण्डेय
इस पुस्तक को पढ़ते हुए श्रीकांत बाबू को धन्यवाद करने की असीम उत्कंठा हो रही है। दरअसल श्रीकांत द्वारा संकलित ‘बिहारः चिट्ठियों की राजनीति’ पुस्तक कोई साहित्यिक विमर्श की प्रस्तुति नहीं है जिसकी साहित्यिक और अलंकारिक परिपाटी पर समीक्षा की जाए। वस्तुतः यह एक ऐसा संकलन है जो राजनीति की वास्तविकता से संवाद कराता है। बिहार और वहां की राजनीति के संदर्भ में अभी तक जो जानकारी थी वो इस पुस्तक के अध्ययन से और भी व्यापक हो जाती है। इससे पहले कि किसी विशेष पत्र का जिक्र हो, इस पुस्तक की महत्ता पर थोड़ी और चर्चा अपेक्षित है। यह ऐसा संकलन है जो बिहार के हर काल को आइने में उतारता है। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद से लेकर नीतीश कुमार तक के पत्र ने, न सिर्फ राजनेताओं के आपसी वैचारिक मतभेद को उजागर किया है बल्कि जातिवाद, हिन्दु-मुस्लिम एकता, वोट-बैंक की राजनीति और आपसी तनातनी पर से भी पर्दा उठाया है। इस संकलन का पहला पत्र जो 1947 में डॉ राजेन्द्र प्रसाद द्वारा श्रीबाबू को लिखा गया था, वो बिहार की जातिगत और हिन्दु-मुस्लिम एकता की व्यक्तिवादी सोच पर आधरित राजनीति को दर्शाता है जो आजतक बिहार की राजनीति में परिलक्षित हो रही है। इस संकलन में खास बात यह है कि इसमें जितने भी राजनेताओं के पत्र शामिल किए गए हैं वो नेता किसी-न-किसी बड़े आंदोलन की उपज हैं चाहे वो राजेन्द्र बाबू हों या फिर नीतीश कुमार। और सबके राजनीतिक स्त्रोत एक ही हैं। अर्थात् बिहार की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर दृष्टिगोचर होने वाले सभी राजनेता इतिहास की परिस्थितियों से बाहर निकले हैं जिन्हें राजनीतिक महत्वकांक्षाओं ने एक-दूसरे के सामने खड़ा कर दिया है। यह संकलन दरअसल राजनीतिक अन्तर्कलहों और अंतर्विरोधों का प्रतीक है नहीं तो बापू को संबोधित अपने पत्र में सूर्यनारायण आदर्शवादिता की दुहाई नहीं देते। हालांकि यह एकमात्र ऐसा पत्र नहीं है जिसमें आपसी मतभेद और परिस्थितियों की बात कही गई है बल्कि पूरी श्रृंखला है जो वैचारिक और राजनीतिक मतभेद और संवादहीनता के बीच निर्वात में गोता लगा रही है। आज हम जिन नेताओं को राजनीति के आपाधापी से पृथक कर, उनके लिए एक आदर्श दृष्टिकोण रखते हैं उनको संबोधित पत्र या उनके द्वारा लिखे पत्र को पढ़ते हुए एहसास होता है कि वे भी राजनैतिक परिभाषा की परिधि से बाहर नहीं थे। हालांकि इस संकलन में बात सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि राजनीति से आगे उसके अपराधीकरण की भी है। इस संकलित पत्रों से स्पष्ट होता है कि बिहार की राजनीति न सिर्फ जातिगत मुद्दों में उलझी रही बल्कि अपराधिक प्रवृति से भी लबरेज रही है। इससे बिहार की राजनीति का पतन तो हुआ ही है साथ ही नौकरशाही व्यवस्था को भी पतोन्मुख कर दिया। जिसका प्रमाण है अशोक चौधरी द्वारा 1978 में यशवंत सिन्हा को लिखा पत्र जो तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के प्रधान सचिव थे। इसमें लिखी बातों से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन न्याय व्यवस्था को जातीय आधर पर स्थापित किया जा रहा है। हालांकि कुछ पत्रों में इसकी पीड़ा को भी देखा जा सकता है। जैसे ब्रम्हेश्वर मुखिया को लेकर कारा महानिरीक्षक को लिखा गया बक्सर के पुलिस अधीक्षक अमिताभ कुमार दास का पत्र। संकलित पत्रों को पढ़कर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि न सिर्फ बिहार शुरू से ही जातिवाद की राजनीति के दलदल में फंसा रहा बल्कि जितने भी बड़े नेता हुए हैं वो जातिवादी रहे हैं। हालांकि वर्तमान बिहार जो तथाकथित विकास की सीढ़ियों पर लगातार अग्रसर हो रहा है आज भी इस जातिगत मुद्दों से उबरा नहीं है। विकास के ‘अग्रदूत’ बने नीतीश कुमार भी इसी जोड़-तोड़ के परिणाम हैं। नीतीश कुमार जहां दलितों की राजनीति करते रहे और आरोप झेलते रहे कि उनके बाहरी और भीतरी व्यक्तित्व में काफी असमानता है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार के समकालीन लालू यादव के पत्रों को पढ़कर यह स्पष्ट होता है कि वे हमेशा जातिगत आधारों के भरोसे रहे। वे हमेशा अवसरवादिता की राजनीति करते रहे। चाहे वो बिहार में मुख्यमंत्री बने रहने का दौर हो या फिर केन्द्र में रेलमंत्री बनने का। सभी परिस्थितियों में उनके अवसरवादी होने की भावना परिलक्षित होती है। हालांकि इस बीच शिवानंद तिवारी के पत्रों की भी बड़ी चर्चा रही। उनके लिखे पत्रों से तो यह स्पष्ट होता है कि वो लालू यादव और नीतीश कुमार के दो ध्रुवी खेमों में डोलते रहे। वे कभी लालू यादव के शुभचिंतक बन उन्हें नसीहत देते रहे तो कभी नीतीश कुमार को। चिट्ठियों की इस राजनीति में सबसे ज्यादा राजनीतिक दाव-पेंच लालू यादव और नीतीश कुमार के पत्र में देखने को मिलता है। यह उस दौर की बात थी जब महाराष्ट्र में रेलवे की परीक्षा देने गए बिहारियों के साथ हिंसा की घटना हुई थी। तब लालू यादव केन्द्र में रेलमंत्री थे और नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री । इन दोनों के पत्रों को पढ़कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस वक्त राजनीति किस कदर की जा रही थी। इसके अलावा इसमें कुछ पत्र और भी शामिल हैं जो बिहार की समाजवादी राजनीति को दर्शाते हैं। जैसे कर्पूरी ठाकुर और रामानंद तिवारी के बीच का पत्र। बहरहाल इस पुस्तक के माध्यम से आजादी के छह दशकों के राजनीति परिदृश्य में हुए बदलावों को देखा जा सकता है। दरअसल ये सभी पत्र बिहार की राजनीति को समझने का जरिया प्रदान करते हैं। इससे यह भी समझा जा सकता है कि बिहार की राजनीति तीन पीढ़ियों से गुजरी है और जिस युग की बागडोर जिन नेताओं के पास थी उनकी सोच अगली पीढ़ी के नेताओं से कितनी पृथक थी। 

बिहारः चिट्ठियों की राजनीतिः श्रीकांत
वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज
नई दिल्ली- 110 002
कीमतः 200रु.

AMAR BHARTI (HINDI DAILY)
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