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Wednesday, 10 July 2013

गांधी परिवार देश को लूट रहा है: रामदेव

योग गुर बाबा रामदेव ने कहा कि उनके कार्यकर्ता घर-घर जाकर प्रचार करके लोगों से कांग्रेस के खिलाफ मतदान करने का आग्रह करेंगे जो कि उनके अनुसार देश को ‘‘लूट’’ रही है। रामदेव ने भाजपा नेता एवं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्थन की घोषणा करते हुए कहा, ‘‘कांग्रेस और गांधी परिवार देश को लूट रहा है। कांग्रेस मोदी को साम्प्रदायिक करार देकर बदनाम कर रही है क्योंकि अगले चुनाव में वह राहुल गांधी से मुकाबला करने को तैयार है।’’ उन्होंने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘हमारे युवा भारत कार्यकर्ता घर-घर जाकर प्रचार करेंगे और लोगों को कांग्रेस के खिलाफ मतदान करने के लिए समझाएंगे।’’ उन्होंने कहा कि वह मोदी का इसलिए समर्थन कर रहे हैं क्योंकि देश के सामने कई मुद्दे हैं। हालांकि यह पूछे जाने पर क्या वह भाजपा का एक पार्टी के रूप में समर्थन करेंगे तो उन्होंने कोई सीधा उत्तर नहीं दिया। उन्होंने कहा, ‘‘हम भाजपा को समर्थन देने के बारे में सोच सकते हैं यदि वह हमारी मांगों को अपने घोषणापत्र में शामिल करे।’’ रामदेव ने आशा जतायी कि जदयू नेता नीतीश कुमार राजग से अलग होने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार करेंगे और चुनाव के बाद उसमें वापसी करेंगे। उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि वह सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे से अलग नहीं हुए हैं और वह उनके ‘‘सम्पर्क’’ में रहेंगे।

Tuesday, 11 September 2012

'मुगलों और अंग्रेजों के मुखबिर थे दिग्गी के पूर्वज'

मुंबई।। ठाकरे परिवार को बिहार मूल का बताने वाले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह पर उन्हीं के अंदाज में पलटवार किया गया है। शिवसेना के मुखपत्र 'दोपहर का सामना' के एक लेख में दिग्विजय के पूर्वजों 'दगाबाज' कहते हुए दावा किया गया है कि वे मुगलों और अंग्रेजों के मुखबिर थे। लेख में ठाकरे के पूर्वजों की खूब तारीफ गई है। कहा गया है कि शिवाजी की सेना में ठाकरे के पूर्वजों का अहम स्थान रहा है। वहीं, दिग्विजय को खिंची कुल का बताया गया है। लेख में कहा गया है कि दिग्विजय के पूर्वज मुगलों और अंग्रेजों की मुखबिरी करते थे।

इसमें लिखा गया है, 'ठाकरे कुल पर आरोप लगाने वाले दिग्विजय सिंह का कुल भी जांच लिया जाए। ठाकरे कुल के पूर्वज तो छत्रपति शिवराज की सेना के शूरवीर थे। वे हिंदू स्वराज के लिए लड़ रहे थे। दिग्विजय सिंह का कुल खींची राजपूतों का है। वे जिस राघोगढ़ रियासत के राजा हैं उसका अधिकृत इतिहास उनके खींची होने की पुष्टि करता है। खींची संस्थान, जोधपुर से प्रकाशित 'सर्वे ऑफ खींची हिस्ट्री'जिसके लेखक ए.एच निजामी और जी. ए. खींची हैं, का दावा है कि खींची उपजाति राजपूत धन लेकर युद्ध करने के लिए कुख्यात रहे हैं। ... दिग्वजिय जिस रोघागढ़ रियासत के कुंवर हैं, वह रियासत गरीबदास नामक योद्धा को बादशाह अकबर ने दी थी। जब राजपूताना और मामलाव के अधिकांश क्षत्रिय राणा प्रताप की ओर हो लिए थे, तब भी राघोगढ़ का गरीबदास अकबर का मुखबिर था। इस गद्दी पर 17 97 तक दिग्विजय का पूर्वज बलवंत सिंह मौजूद था। '1778 के प्रथम मराठा-अंग्रेज युद्ध में बलवंत सिंह ने अंग्रेजों की मदद की थी।

गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों से दिग्विजय सिंह और ठाकरे परिवार के बीच जुबानी जंग छिड़ी हुई है। विवाद तब शुरू हुआ जब दिग्विजय सिंह ने यह कहा कि बिहारियों का विरोध करने वाला ठाकरे परिवार खुद बिहार से आया है। इसके लिए उन्होंने ठाकरे परिवार पर लिखी किताब का हवाला भी दिया। दिग्विजय के इस बयान से तिलमिलाए उद्धव ठाकरे ने उन्हें पागल तक कह डाला।

कोयला घोटाले में एक और कांग्रेसी नेता का नाम

कोल घोटाले में एक और कांग्रेसी नेता संतोष बगरोड़िया का नाम सामने आया है। एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक पूर्व कोयला मंत्री संतोष बगरोड़िया के परिवार की 10 फीसदी हिस्सेदारी वाली कंपनी मिनेक्स फिनवैस्ट प्राइवेट लिमिटेड को खनन का कोई अनुभव नहीं होने के बावजूद पकरी बरवाडीह खदान का अनु‌बंध दिया गया।

खास बात यह है कि इस कंपनी के पास अधिक वित्तीय स्‍त्रोत नहीं थे, फिर भी 23 हजार करोड़ रुपए का अनुबंध दिया गया। कोयला मंत्रालय के तहत एक पीएसयू सिंगरेनी कोलरी को छोड़कर खनन के अनुबंध के लिए कोई दूसरी बोली नहीं थी। इसके बाद सिंगरेली की बोली रद्द कर दी गई और बगरोडिया के भाई विनोद की हिस्सेदारी वाली कंपनी को ब्लॉक का कोयला खनन का अनुबंध दिया गया।

मालूम हो कि बगरोड़िया मनमोहन सराकर में अप्रैल 2008 से मई 2009 के बीच कोयला राज्य मंत्री रहे थे। हालांकि बगरोड़िया ने अपने भाई की हिस्सेदारी वाली कंपनी को अनुबंध दिए जाने में अपनी किसी भी भूमिका से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि विनोद उनके भाई है लेकिन उन्हें पता नहीं ‌है वे किस तरह का कारोबार कर रहे हैं और न ही वे कारोबार के सिलसिले में उनसे कोई सलाह लेते हैं।

Tuesday, 17 July 2012

सलमान से 'गुपचुप' क्‍यों मिले? पूछने पर भड़के अन्‍ना

नई दिल्‍ली. जनलोकपाल की मांग को लेकर सरकार को परेशानी में डालने वाले समाजसेवी अन्‍ना हजारे की केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद से हुई गुपचुप मुलाकात पर सवाल उठने लगे हैं। बताया जा रहा है कि अन्‍ना और सलमान की यह मुलाकात बीते 23 को हुई थी। पुणे-नासिक हाईवे से 90 किलोमीटर दूर फिरौदिया नाम के गेस्ट हाउस में हुई इस मुलाकात के बारे में अब अन्ना कुछ भी बोलना नहीं चाह रहे हैं। पुणे में पत्रकारों ने अन्‍ना से जब इस मुलाकात के बारे में सवाल किया तो वह कुछ नहीं बोले। हालांकि उन्‍होंने इससे इनकार भी नहीं किया कि उनकी सलमान खुर्शीद से मीटिंग हुई थी। उन्‍होंने कहा कि समय आने पर सब कुछ बता देंगे। जिस रिपोर्टर ने अन्‍ना ने यह सवाल किया उसपर ही अन्‍ना भड़क गए। उन्‍होंने पूछा, 'आपकी इसमें क्‍यों दिलचस्‍पी है? अन्ना को जब पारदर्शिता का हवाला दिया गया, तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि 'पारदर्शिता के चक्कर में जेल जाना पड़ेगा।' गौरतलब है कि इस प्रेस कांफ्रेंस में अन्‍ना के साथ बाबा रामदेव भी थे। खुर्शीद ने इस सवाल के जवाब में संकेत दिया कि वो अन्‍ना से मिले हैं। उन्‍होंने कहा, 'मैं अच्‍छे लोगों से मिलता रहता हूं।' हालांकि उन्‍होंने यह नहीं बताया कि दोनों के बीच क्‍या बात हुई? वहीं कांग्रेस प्रवक्‍ता मनीष तिवारी इस सवाल के जवाब से पल्‍ला झाड़ते दिखे। सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय मंत्री अपनी पत्‍नी लुई खुर्शीद के साथ अन्‍ना से मिलने नासिक पहुंचे। केंद्रीय मंत्री ने अन्‍ना से अनुरोध किया कि टीम अन्‍ना की तरफ से जारी की गई भ्रष्‍ट मंत्रियों की लिस्‍ट में से उनका नाम हटा लिया जाए। ऐसी खबर है कि अन्ना और उनके ड्राइवर ही इस मुलाकात में आए थे इसलिए इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि अन्ना इस मीटिंग में अकेले ही आए और उनके सहयोगियों को इसकी जानकारी नहीं थी। अन्ना के बेहद करीबी माने जाने वाले और अन्ना की सभी गतिविधियों की जानकारी देते रहने वाले सुरेश पठारे ने भी इस बाबत कुछ नहीं बताया है। अन्ना हजारे की खुर्शीद की इस गुपचुप मुलाकात पर सवाल उठने लाजमी हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले टीम अन्‍ना ने बीते 26 मई को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित 15 मंत्रियों के भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त होने का आरोप लगाया था। टीम अन्‍ना ने भ्रष्‍टाचार के आरोपों के सबूत के तौर पर दस्‍तावेजों के साथ एक चिट्ठी पीएम को लिखी थी। इसमें हजारे के अलावा अरविंद केजरीवाल, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, किरण बेदी और मनीष सिसौदिया के दस्‍तखत थे।

Monday, 18 June 2012

कांग्रेस ने कसी दिग्विजय पर नकेल, पार्टी की ओर से बयान देने पर लगी रोक

नई दिल्‍ली. आए दिन अपने बयानों से पार्टी को मुश्किलों में डालने वाले दिग्विजय सिंह पर कांग्रेस ने सख्‍ती बरतनी शुरू कर दी है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का कोई भी बयान अब पार्टी का बयान नहीं माना जाएगा। कांग्रेस के मीडिया सेल ने आज एक बयान जारी कर यह फरमान सुनाया। बयान में कहा गया है, दिग्विजय सिंह पार्टी की तरफ से बोलने के लिए अधिकृत नहीं हैं। दिग्विजय सिंह ने हाल में तृणमूल कांग्रेस चीफ और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी पर टिप्‍पणी की थी। सूत्रों का कहना है कि पार्टी नहीं चाहती कि राष्‍ट्रपति चुनाव के मसले पर ममता से यूपीए की दूरी बढ़े। ममता की तरफ से यूपीए के उम्‍मीदवारों का नाम खारिज किए जाने के बाद दिग्विजय ने कहा था, यह पार्टी अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और पीएम मनमोहन सिंह के लिए बेहद शर्मनाक है कि ममता बनर्जी ने न सिर्फ यूपीए के उम्‍मीदवारों के नाम खारिज कर दिए बल्कि समाजवादी पार्टी से हाथ मिलाकर तीन और नाम उछाल दिए जिसमें एक पीएम का भी नाम शामिल था। यूपीए की अहम सहयोगी ममता बनर्जी वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाए जाने का भी विरोध करती आ रही हैं। दिग्विजय ने इस मसले पर एक टीवी शो के दौरान कहा था, हर बात की सीमा होती है, जहां तक कोई झुक सकता है। दिग्विजय से पूछा गया था कि ममता को यूपीए से बाहर जाने से रोकने के लिए कांग्रेस किस सीमा तक झुक सकती है। अपनी बात के साथ ही दिग्विजय ने यह साफ किया कि कांग्रेस अपनी ओर से ममता से ‘जाने के लिए’ नहीं कहेगी और न ही ऐसा कुछ करेगी कि ममता यूपीए से अलग हो जाएं। उन्होंने कहा, ममता को मनाने के हमने सारे प्रयास किए थे। एक सीमा तक कांग्रेस ने ममता के नखरे भी उठाए हैं, लेकिन एक सीमा के बाद कुछ भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। दिग्विजय सिंह ने यहां तक कहा दिया था, ममता कई मामलों में अस्थिर हैं। वह ऐसी ही हैं। उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं। वह ममता हैं। वह आपकी सोच के विपरीत कुछ भी कर गुजर सकती हैं।

Saturday, 21 April 2012

भाजपा की जीत या कांग्रेस की हार : अजय पाण्डेय

हालांकि कांग्रेस इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती कि दिल्ली नगर निगम चुनाव, विधानसभा चुनाव का सेमी फाइनल है, वो इस बात को सिरे से खारिज कर रही है कि इन चुनावों के परिणाम विधानसभा चुनावों पर असर डालेंगे । कांग्रेसी नेता इसे नगर निगम चुनाव के रूप में ही देखने की नसीहत दे रहे और चुनावी सेमी पफाइनल को मीडिया की उपज बता रहे हैं। अब कांग्रेस चाहे इसे मीडिया की उपज बताये फिर चुनाव बाद मीडिया में अक्सर दी जाने वाली चुनावी दलील दे, यह परिणाम दिल्ली की बदलती हुई राजनीतिक परिपाटी को जरूर दर्शाता है। किसी भी राज्; में जब स्थानी; चुनाव होते हैं तो सबसे ज्यादा उस राज्य की सत्ताधारी पार्टी और सरकार की साख दाव पर लगी रहती है। ;हां भी वैसा ही हुआ चुनाव की कमान प्रदेश में सत्तानशीं शीला दीक्षित को सौंप दी गई। उन्होंने दमखम से पार्टी का प्रचार प्रसार तो किया लेकिन उस प्रचार में इतना भी दम नहीं था जिससे वो नगर निगम के तीनों हिस्सों में से किसी एक में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा सके। बहरहाल हर चुनाव के बाद हारी हुई पार्टी एक सामान्य और पुरानी परंपराओं का निर्वहन करते हुए चुनावी मंथन जरूर करती है जैसा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गाँधी ने किया था। लेकिन हकीकत यह है कि कोई भी पार्टी इन चुनावी मंथनों से सबक नहीं लेती। वस्तुतः दिल्ली की जो स्थिति है वो केन्द सरकार बनाम राज्य सरकार बनाम स्थानी; निकायों की त्रिगुट ध्रुवों में बंटी हुई है। कांग्रेस अपने चुनाव प्रचार में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाते समय यह भूल गई कि यह भ्रष्टाचार उसी की कोख से पैदा होकर, उसी के आगोश में पोषित हुआ था, ,ऐसे में कांग्रेस द्वारा अपने ही राज्य में भ्रष्टाचार की बात करना उसकी राजनीतिक परिपक्वता पर सवालिया निशान लगाता है। कांग्रेस के कुछ नेता कहते हैं यह स्थानी; चुनाव था, जिसमें स्थानी; मुद्दे हावी होते हैं यह सही भी है लेकिन क्या कांग्रेस के पास इस बात का जवाब है कि वो उत्तर प्रदेश में क्यों हार गई? वहां भी कांग्रेस ने स्थानी; मुद्दों के ही तार छेड़े थे। राहुल से लेकर बड़े-बड़े पार्टी सिपहसालारों ने स्थानी; मुद्दों तक की ही बात की। भ्रष्टाचार, महंगाई आदि जैसे मुद्दों पर जब भी पूछने की कोशिश की गई सबने यही कहा कि यह राज्य स्तरीय चुनाव है जहां यहीं के मुद्दे हावी रहेंगे लेकिन प्रदेश में क्या हुआ सबके सामने है। दरअसल इस तरह के बयां राजनीतिक परम्परा के निर्वहन के अलावा कुछ और नहीं। कांग्रेस जिस चुनाव को जीतने के लिए पूर्व में न जाने कितने जतन किए सत्ता में रहते हुए उसने निगम को तीन हिस्सों तक में बांट दिया । लेकिन उसके सारे दाव उल्टे पड गए । आज यह प्रश्न दीगर है कि कांग्रेस हार के लिए किसे जिम्मेदार ठहराएगी ? क्या भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया इसलिए उसकी हार हुई, या फिर उसने भ्रष्टाचार, महंगाई आदि को मुद्दा बनाकर मतदाताओं को यह भरोसा दिला दिया कि कांग्रेस ने मान लिया कि वाकई राजधानी में भ्रष्टाचार और मंहगाई है और दिल्ली की जनता इतना तो जानती ही है कि यह मंहगाई और भ्रष्टाचार की जननी कौन है?

Tuesday, 17 April 2012

दिल्‍ली: 15 साल में कांग्रेस की सबसे बड़ी हार, तीनों निगमों में भाजपा की बादशाहत

नई दिल्‍ली. दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) पर इस बार भी बीजेपी काबिज होती दिख रही है। तीनों निगमों की 272 सीटों पर हुए चुनाव की मतगणना जारी है। अब तक आए नतीजों के मुताबिक तीनों जोन में बीजेपी काफी आगे चल रही है और उसने कांग्रेस को काफी पीछे छोड़ दिया है। अविभाजित एमसीडी में बीजेपी के 164 पार्षद थे, जबकि कांग्रेस के 67 और बीएसपी के 17 पार्षद थे। बीजेपी ने इन चुनावों में दीक्षित सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को मुद्दा बनाया, जबकि कांग्रेस एमसीडी प्रशासन में भगवा पार्टी के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर चल रही थी। अब एमसीडी चुनाव में कांग्रेस की मौजूदा हालत को मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। शीला दीक्षित लगातार तीन बार से दिल्‍ली की सीएम हैं। कांग्रेस को हाल में हुए विधानसभा चुनाव में पंजाब, गोवा और यूपी में करारी हार का सामना करना पड़ा है। बीएमसी चुनाव में भी कांग्रेस को करारी शिकस्‍त झेलनी पड़ी है। ऐसे में दिल्‍ली नगर निगम चुनाव के नतीजे कांग्रेस को चिंता में डालने वाले हैं क्‍योंकि 18 महीने के बाद दिल्‍ली विधानसभा जबकि 2014 में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। बीजेपी के दिल्‍ली प्रभारी वेंकैया नायडू ने चुनाव नतीजों पर टिप्‍पणी करते हुए कहा कि कांग्रेस ने बीजेपी को कमजोर करने के लिए एमसीडी को तीन हिस्‍सों में बांटा लेकिन उनका प्रयोग कामयाब नहीं हो सका। उन्‍होंने कहा, ‘यह तो अभी सेमीफाइनल है। फाइनल यानी दिल्‍ली विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में बीजेपी को भारी जीत मिलेगी। एमसीडी चुनाव के परिणाम से साफ संकेत मिले हैं कि लोग कांग्रेस के खिलाफ हैं।’ बीजेपी नेता विजय कुमार मल्‍होत्रा ने कहा कि यह कांग्रेस के खिलाफ जनादेश है। महंगाई से जनता परेशान है इसलिए उसने कांग्रेस के खिलाफ वोट किया। वहीं कांग्रेस प्रवक्‍ता राशिद अल्‍वी ने कहा कि इन चुनावों को स्‍थानीय चुनावों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। हालांकि उन्‍होंने जनादेश का सम्‍मान किया। जल्‍द आएंगे नतीजे राजधानी के 32 केन्द्रों पर सुबह आठ बजे से मतगणना चल रही है। वोटों की गिनती के लिए राज्य चुनाव आयोग ने मतदान केन्द्रों पर लगभग सात हजार कर्मचारियों को तैनात किया है। चुनाव के तहत 2423 प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला होगा। थोड़ी देर में पूरे नतीजे (सूची रिलेटेड आर्टिकल में पढ़ें) आ जाने की उम्‍मीद है। रविवार को हुए निगम चुनाव में 55 फीसदी मतदान हुआ था, जो कि वर्ष 2007 में हुए निगम चुनाव से 12 फीसदी ज्यादा है। पूर्वी नगर निगम में 57 फीसदी, जबकि उत्तरी नगर निगम में 55 फीसदी और दक्षिणी दिल्ली में महज 53 फीसदी वोटिंग हुई थी। सबसे ज्यादा (89 फीसदी) वोटिंग पूर्वी दिल्ली के वार्ड संख्या 248, वेलकम कॉलोनी में और सबसे कम (31 फीसदी) दक्षिणी दिल्ली के वार्ड संख्या 146, साध नगर में हुई। वार्ड संख्या 167, आरके पुरम में भी महज 36 फीसदी मतदान हुआ था। आरकेपुरम क्षेत्र में अधिकांशत: पढ़े-लिखे और नौकरीपेशा लोग निवास करते हैं, इसके बावजूद यहां पर लोगों ने वोट डालने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। तीनों निगमों के जिन वार्डों में अधिक मतदान हुआ उनमें सामान्य और मध्यम वर्ग के साथ ही कम पढ़े-लिखे तबके के लोग निवास करते हैं।